Purusottam Singh Thakur

Hi Purusottam Singh Thakur is basically a journalist having more than 20 years experience in both print and electronic media which includes NDTV India. He loves to be called a rural reporter as his mentor P Sainath did. Now he is with the Azim Premji Foundation where one of his important job is to write on good practices in schools ,inspiring stories of teachers,communities etc under reasons for hope. his contact mail id: purusottam.thakur@azimpremjifoundation.org purusottam25@gmail.com

Friday, 27 November 2015

Chandanpur school

छत्तीसगढ़ का एक पहरिया आदिवासी स्कूल
पुरुषोत्तम सिंह ठाकुर
हम जिस स्कूल की बात करने जा रहे हैं वह घने जंगलों के बीच स्थित एक पिछड़े जन जातियों की गाँव में है। गाँव का नाम चंदनपुर है जो छत्तीसगढ़ के धमतरी ज़िले के आदिवासी विकासखंड नगरी में मौजूद है। और स्कूल है शासकीय प्राथमिकशाला, चंदनपुर (कोर्रा) और वह जन जाति हैं कमार।

जंगलों के बीच भी रहने वाले इन कमार आदिवासियों के लिए एक कमरे का एक स्कूल है जहां बच्चे पढ़ने आरहे हैं। स्कूल में बाउंड्री नहीं है अभी शौचालय जरूर बन रहा है। अभी यहाँ 2 शिक्षक है, जितेंद्र कुमार ध्रुव और टेकराम साहू । जितेंद्र ध्रुव का तो यह पहला नियुक्ति है जो यहाँ 2013 में आए जब की टेकरम पिछले साल शिक्षकों की युक्तियुक्त करण के तहत आए।

हमने बच्चों से यूं बातें की कि छुट्टियों में क्या किया ? उनमें से ज्यादातर ने कहा बहुत खेले । उनमें से कईयों ने कहा चूहा मारा, चिड़िया मारा । कमार चूहा और चिड़िया भी मार के खाते हैं और बच्चे भी बचपन से इस काम में पारंगत होते हैं।
और एक यह स्कूल गये थे तब गर्मी का दिन था और एक दो बच्चे ही आए थे। तब शिक्षक जितेंद्र ध्रुव गाँव की ओर निकल पड़े बच्चों के घर की ओर । कक्षा दूसरी के एक छात्रा को ढूंढते हुए गाँव के पास ही वह महुआ के पेड़ के नजदीक पहुँच गये । वह छात्रा ने कहा की उसकी नानी आज गाँव गई है इसलिए उन्होने कहा की आज महुआ तोड़ने चली जा इसलिए आई है। ऐसे ही ज्यादातर बच्चे महुआ तोड़ने चले गये थे।

हमने शिक्षकों से चर्चा की और स्कूल के बारे में शिक्षकों का नज़रिया जानना चाहा । इस पर शिक्षक जितेंद्र ध्रुव ने कहा की, “ आप देख ही रहे हैं स्कूल में यूं तो बहुत सारी परेशानी हैं और कुछ कुछ अब दूर हो रहा है। मुख्य परेशानी है शौचालय का जो इस साल बन रहा है। और दूसरी है अहाता की वह भी अगर बन जाता तो यह स्कूल आकर्षक लगता और बहुत सारी परेशानी लगभग 
दूर हो जाता। ”

और पढ़ने लिखने के हिसाब से देखा जाये तो ?

“ पढ़ने लिखने के हिसाब से देखा जाये तो गाँव और स्कूल तो पिछड़ा हुआ ही है। क्योंकि पिछड़े जन जातिओं के बच्चे हैं जो उच्च शिक्षा प्राप्त ही नहीं कर पाते ।
हम लोग अपने तरफ से अपने शिक्षण कार्य में नए नए नवाचार कर रहे हैं, जिसके चलते बच्चे भी अब आसानी से हम से घुलमिल चुके हैं। अब अपनी बातों को हम से शेयर भी करने लगे हैं । 

पहले मौसम के अनुरूप बच्चों में दादखाज खुजली होती थी लेकिन अब समय समय पर यहाँ जो आने वाले एएनएम और एम पी डब्लू से इन बच्चों का नियमित स्वास्थ्य परीक्षण और दवाई मुहैया करवाने से वह कम हुआ है और स्वच्छता आया है।
बच्चों के कपड़े के बटन वगैरह टूटे हुए होते थे तो हमने स्कूल में सुई धागा और बटन भी मुहैया कराया।

बच्चों को नेल कटर देकर हम उनका उंगली पकड़कर नाखून काटे हैं तो अब धीरे धीरे सीख रहे हैं बच्चे नाखून काटना। अब तो बच्चे स्वयं ही बोलते हैं की सर नेल कटर दो नाखून बड़ा हो गया है। ”
शिक्षा में गुणवत्ता सुधार के लिए क्या कर रहे हैं ?

“ गुणवत्ता सुधार के लिए डेलि होम वर्क करवाते हैं। उन्हें बार बार बोलने के बावजूद होम वर्क करके नहीं आते हैंऔर हमें पता है की घर में ऐसा माहौल भी नहीं है , इसलिए प्रार्थना के बाद हम होमवर्क करवाते हैं।
बच्चे दातुन करके नहीं आते थे, तो प्रार्थना के बाद हम अपने सामने में नियमित रूप से दातुन करवाए हैं।

यह जंगली इलका है इसका भी हम बच्चों में शिक्षा शिक्षण में भरपूर उपोयोग कर रहे हैं। हम उन्हें कक्षा से बाहर लेकर वातावरण के बारे में बताते हैं। यूं तो स्थानीय  पेड़ों के बारे में पक्षियों के बारे में जानकारी उनकी तरह से पुख्ता है पर उस पेड़ों और पक्षियों के नाम वह अपने स्थानीय भाषा में जानते हैं जिन्हें हम पुस्तक के भाषा में बताकर जानकारी देते हैं। क्योंकि वस्तुओं का प्रत्यक्ष अवलोकन भी जरूरी है तो बच्चा अपना सही समझ बना पाता है, वह दिमाग में स्थायी रहता है उसे भूलते नहीं हैं।
 “ यहाँ कोई भी जरूरत हो स्कूल का तो गाँव वाले और पालक पूरा सहयोग करते हैं। जिस से हम को भी प्रोत्साहन मिलता है ।

हम अब इन बच्चों के भाषा भी कुछ कुछ सीखने लगे हैं। जब उस में से कुछ शब्दों का प्रयोग करते हैं तो बच्चे भी काफी खुश होते हैं। ”
अब आपको अच्छा लग रहा है ?

“ अब धीरे धीरे अच्छा लगने लगा है। नालों में पानी भरजाता है, 2 किमी दूर मोटर साइकल छोड़ के आना पड़ता है है पर अब धीरे धीरे हम यहाँ रमने लगे हैं और यह स्कूल और गाँव अच्छा लागने लगा है।

शाला इतिहास पंजी के अनुसार यह स्कूल गाँव वालों के बार बार मांग के बाद 8 जून 2006 में चंदनपुर गाँव के ही एक ग्रामीण रतिराम कमार के घर में शुरू हुआ और छ्गन लाल विश्वकर्मा शिक्षक के बतौर नियुक्त हुए, इस प्रकार कूल 16 बच्चों से यह स्कूल शुरू हुआ। लेकिन दुख की बात है की 2 महीने भी पूरे नहीं हुआ था की शिक्षक इस्तीफा देकर चले गए। इस प्रकार पिछले 8 सालों में इस स्कूल में 10 शिक्षक नियुक्त हुए जिनमें से 5 शिक्षक इस्तीफा देकर चले गए। ”

अब लेकिन इस स्कूल में 2 शिक्षकों का टिकने इस गाँव के बुजुर्ग मयाराम की उम्मीदें जग गई है। उन्होने कहा की यहाँ अब माध्यमिक शाला की जरूरत है क्योंकि यह एक तो जंगली इलाका है दूसरी यहाँ बारिश में एक तरह से रास्ता बंद हो जाता है जिस से बच्चों का आना जाना मुश्किल हो जाता है। तो अब प्रशासन और सरकार की बारी है की वह इन बच्चों के लिए माध्यमिक शाला खोले और गाँव में कम से कम अच्छी रास्ता मुहैया कराये।


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